Monday, 4 May 2015

बुद्धम् शरणं गच्छामि

Image Courtesy - santabanta.com

बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती  बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों का सबसे बड़ा त्योहार है।।  यह पर्व वैशाख माह में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा का बिशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसी दिन महात्मा बुद्ध का जन्म भी हुआ था और यही उनकी ज्ञान प्राप्ति और निर्वाण (मृत्यु) का भी दिन है।

महात्मा बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी (नेपाल) नामक स्थान पर हुआ था। बुद्ध का जन्म एक राजसी परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इनके पिता का नाम शुद्धोधन एवं माताजी का नाम महामाया था।  सिद्धार्थ बचपन से ही हिन्सा के प्रबल विरोधी थे । बुद्ध को महल से बाहर जाने की मनाही थी। लेकिन एक दिन सिद्धार्थ को महल से बाहर जाने का मौका मिला जहाँ रास्ते में उन्होने  दयनीय दृश्य देखा । उन्होंने एक अत्यंत बीमार व्यक्ति को देखा, जब थोड़ा आगे गए तो एक बूढ़े आदमी को देखा तथा अंत में एक मृत व्यक्ति को देखा। इन सब दृश्यों को देखकर उनका मन व्यथित हो गया और उन्हें संसार से वैराग्य हो गया।
बुद्ध ने एक पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान की खोज में कठोर तपस्या की जहाँ उन्हें सत्य का ज्ञान हुआ जिसे “सम्बोधि” कहा जाता है। जिस पेड़ के नीचे बोध को जान हुआ उस वृक्ष को बोधि वृक्ष के नाम से जाना जाता है। महात्मा बुद्ध को जिस स्थान पर  ज्ञान की प्राप्ति हुई उस स्थान को बोधगया के नाम से जाना जाता है। सारनाथ में महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया और बौद्ध धर्म की स्थापना की।  वैशाख पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध को निर्वाण की प्राप्ति हुई जिसे ‘महापरिनिर्वाण’ कहा जाता है।

महात्मा बुद्ध ने सत्य, अहिंन्सा तथा शांति का सन्देश दिया। शांति के इसी सन्देश को अपनाते हुए राजा अशोक ने कलिंग के युद्ध के उपरांत हिंसा से विरक्त होकर बुद्ध की शरण में जाने का निश्चय किया। आज भी संसार में शांति स्थापना के लिए महात्मा बुद्ध के इसी शांति सन्देश की जरूरत है।


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