Thursday, 28 May 2015

गंगा दशहरा

गंगा नदी का हिन्दू धर्म मे विशेष महत्व है।  हिन्दू धर्म मे ऐसी मान्यता कि गंगा नदी मे स्नान करने से सभी पापों का क्षय हो जाता है। गंगा को एक पवित्र नदी माना गया है इसलिए हिन्दुओ के लिए विशेष पूजनीय है।  

ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का दिन गंगा दशहरा के रूप मे मनाया जाता है।  ऐसी मान्यता है कि ऋषि भागीरथी की तपस्या से प्रसन्न हो इसी दिन स्वर्ग से माँ गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह कल्याणकारी पर्व माना जाता है। दशमी तिथि होने के फलस्वरूप गंगा पूजन में 10 को शुभांक माना जाता है। इसलिए पूजन मे 10 तरह के फूल, गंध, दीपक, नैवेद्य, पान के पत्ते, फल आदि का इस्तेमाल किया जाता है । इसी प्रकार दान भी 10 ब्राह्मणों को करना चाहिए और 10 डुबकियां नदी में लगानी चाहिए। क्यूंकी माँ गंगा का उद्गम भगवान शिव की जटाओं से हुआ था इसलिए माँ गंगा के साथ साथ भगवान शिव की आराधना का भी विशेष महत्व है।

इस  दिन गंगा  स्नान करने से सभी प्रकार के पापो का नाश होता है   अगर गंगा में स्नान करने में असमर्थ हों तो किसी भी नदी में स्नान कर दान दक्षिणा दे  

गंगा अवतरण की कथा 

अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सागर  ने एक बार अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया।  यज्ञ के अश्व की रक्षा के लिए उनके साठ हजार पुत्र उसके पीछे-पीछे चले।  इंद्र ने ईर्ष्यावश यज्ञ के अश्व को पकड़वाकर कपिल मुनि के आश्रम में बंधवा दिया।   सागर के पुत्र अश्व को सब जगह खोजते हुए जब अंत में कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे तो वहां घोड़े को देखकर क्रोधित हो गए और मुनि को भला-बुरा कहने लगे।  इस पर कपिल मुनि को क्रोध आ गया और उन्होंने शाप देकर राजकुमारों को भस्म कर दिया। कई दिन बीतने पर जब राजकुमार लौटकर नहीं आये तो राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान ने घोड़े का पता लगाया और अपने परिजनों की दुर्दशा भी देखी,  उसे यह भी ज्ञात हुआ कि भस्म हुए राजकुमारों का उद्धार तभी संभव है, जब स्वर्ग लोक से गंगाजी पृथ्वी पर आएं और उनका इन सबकी भस्म से स्पर्श कराया जाये।  

तब भगवान श्रीहरि के वाहन गरुड़जी के परामर्श पर अंशुमान ने सर्वप्रथम अश्वमेघ का अश्व ले जाकर यज्ञ पूरा कराया और फिर अपने पितामह को पितरों की मुक्ति का मार्ग सुझाया।  राजा सागर और अंशुमान ने कड़ी तपस्या की, पर स्वर्ग से गंगाजी को लाना आसान न था इसलिए सफल नहीं हुए।   उसके बाद अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी प्रयास किया परंतु असफल रहे ।  अंत में राजा दिलीप के पुत्र भगीरथ अपने पितरों का उद्धार करने की इच्छा से  मंत्रियों को राज्य-भार सौंपकर गंगाजी को लाने के लिए गोकर्ण तीर्थ में जाकर तप करने लगे।  उनके कठोर तप ने देवताओं तक को विचलित कर दिया और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी उनके समक्ष प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा। भगीरथ ने उनसे गंगा जी  को पृथ्वी पर भेजने की प्रार्थना की। इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि गंगाजी की वेगवती धारा को भूतल पर संभालने के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करना होगा। राजा भगीरथ पुन: महादेव को प्रसन्न करने में जुट गये।  महादेव ने प्रसन्न होकर गंगा की वेगवती धारा को संभालने का दायित्व खुद पर ले लिया। शंकरजी ने अपनी जटाओं में गंगा को रोका और बाद में एक जटा के अग्रभाग से गंगाजल की बूंद कैलाश के पास बिन्दु सरोवर में गिरा दी। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार बिन्दु सरोवर से गंगाजी की सात धाराएं निकलीं-  इनमें तीन धाराएं हादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व दिशा में, सुचक्षु, सीता और सिन्धु-ये तीन धाराएं पश्चिम की ओर निकल पड़ी तथा सातवीं धारा राजा भगीरथ के पीछे -पीछे उनके पूर्वजों के उद्धार के लिए चल पड़ीं।   

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