Monday, 18 May 2015

शनि जयंती

शनि जयंती अर्थात शनिदेव का जन्मदिवस ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है । इस बार शनि जयंती और सोमवती अमावस्या एक ही दिन यानि 18 मई, 2015 को मनाई जा रही है । हिन्दू मान्यताओ के अनुसार धर्म-कर्म के लिहाज से सोमवार का दिन कई मायनों में महत्वपूर्ण होता है। करीब 10 साल बाद एक बार फिर से सोमवती अमावस्या और शनि जयंती एक ही दिन मनाए जा रहे हैं।

शास्त्रों के अनुसार - शनिदेव सूर्यदेव के पुत्र है और इनकी माता का नाम छाया है । सूर्यदेव की पत्नी छाया के पुत्र होने के कारण इनका रंग श्यामवर्ण शनि के भाई हैं मनु और यमराज तथा बहन -यमुनाजी हैं । शनिदेव का शरीर इंद्रनीलमणि के समान है । नीले वस्त्र धारणकिए हुए शनिदेव के मस्तक पर स्वर्णमुकुट सुशोभित रहता है शनि की चार भुजाएं हैं । इनके एक हाथ में धनुष, एक हाथ में बाण, एक हाथ में त्रिशूल और एक हाथ में वरमुद्रा सुशोभित है। शनिदेव का वाहन कौआ है ।

शनि जयंती पर वृष राशि में चार ग्रह रहेंगे।
सूर्य- वृष;
चंद्रमा- वृष;
मंगल- वृष;
बुध- वृष;
गुरु- कर्क;
शुक्र- मिथुन;
शनि- वृश्चिक;
राहु- कन्या;
केतु- मीन

इन चार ग्रहों पर शनि की पूरी नजर रहेगी । सूर्य और मंगल शनि के शत्रु ग्रह माने जाते हैं। इन ग्रहों पर शनि की नजर होने से आज का दिन कुछ लोगों के लिए अच्छा तो कुछ लोगों के लिए सामान्य रह सकता है।

शनि के अशुभ प्रभाव को दूर करने के उपाय :


  • तिल का तेल एक कटोरी में लेकर उसमें अपना मुंह देखकर शनि मंदिर में रख आएं (जिस कटोरी में तेल हो उसे भी घर ना लाएं)।
  • सवापाव साबुत काले उड़द काले कपड़े में बांध कर शुक्रवार को अपने पास रखकर अकेले सोएं। फिर उसको शनिवार को शनि मंदिर में रख आएं। 
  • काला सुरमा से भरी एक शीशी शनिवार को नौ बार सिर से पैर तक अपने ऊपर से वार कर सुनसान जमीन में गाड़ देवें। 
  • किसी कुत्ते को तेल से चुपड़ी हुई रोटी खिलाने से भी शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है। 
  • शनि दोष या शनि की साढ़ेसाती होने की स्थिति मे प्रत्येक शनिवार पीपल के वृक्ष को दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए, शनिदेव का ध्यान करें व पीपल की सात परिक्रमाएं करें।

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