Sunday, 17 May 2015

वट सावित्री व्रत

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या का दिन हिन्दू महिलाओ के लिए विशेष महत्त्व रखता है।  भरणि नक्षत्र और वृषभ राशि में संपन्न होने वाला यह पर्व वट सावित्री व्रत के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष यह पर्व रविवार (17 मई, 2015 ) को मनाया जा रहा है। शास्त्रो के अनुसार भारतीय महिलायें  अपने पति की लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं। मान्यता है कि इसी दिन सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी और 100 पुत्रो को पाने का वरदान प्राप्त किया था। मूलतः यह व्रत-पूजन सौभाग्यवती स्त्रियों का है।

इस व्रत को करने का विधान ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तथा अमावस्या तक है। लेकिन अमावस्या को ही इस व्रत का नियोजन होता है। इस दिन वट यानी  बरगद के वृक्ष का पूजन होता है। इस व्रत को स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने की मंगलकामना से करती हैं।इस व्रत में सबसे अधिक महत्व चने का है। बिना चने के प्रसाद के यह व्रत अधूरा माना जाता है।

 स्कन्दपुराण के अनुसार - वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी, तने में विष्णु और डालियों एवं पत्तों में शिव का वास होता है। इस वृक्ष के नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है। अतः किसी मंदिर में या बरगद (वट) के पेड़ के नीचे बैठ कर ही इस दिन व्रत पूजा करने का प्रावधान है। अग्निपुराण के अनुसार बरगद उत्सर्जन को दर्शाता है। इसीलिए संतान के लिए इच्छित लोग इसकी पूजा करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि अमावस्या के दिन वट वृक्ष की पूजा से सौभाग्य एवं स्थायी धन और सुख-शांति की प्राप्ति होती है।

इसी दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणो की रक्षा की थी। सावित्री और सत्यवान की कथा से वट वृक्ष का महत्व लोगों को ज्ञात हुआ क्योंकि इसी वृक्ष ने सत्यवान को अपनी शाखाओं और शिराओं से घेरकर जंगली पशुओं से उनकी रक्षा की थी। इसी दिन ज्येष्ठ  कृष्ण अमावस्या के दिन वट की पूजा का नियम शुरू हुआ। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या का दिन शनि जयंती के रूप में भी  मनाया जाता है इसलिए  शनिदेव की कृपा पाने के लिए चाहें तो वट वृक्ष की जड़ों को दूध और जल से सींचें इससे त्रिदेव प्रसन्न होते हैं और शनि का प्रकोप कम होता है तथा धन और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन वट वृक्ष की पूजा का महत्त्व महिलाओं के लिए ही नहीं वरन् पुरूषों के लिए भी है क्योंकि वट वृक्ष की पूजा से वंश की भी वृद्घि होती है।

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