Thursday, 14 May 2015

अपरा/अचला एकादशी

हिंदू धर्म में व्रत व उपवास का बहुत महत्व है । दिन विशेष के लिए किसी व्रत का व्याख्यान पुराणो व अन्य धार्मिक ग्रंथो मे बताया गया है ।  उन सभी व्रत/उपवास में एकादशी के व्रत का विशेष महत्व है। ज्येष्ठ मास मे कृष्ण पक्ष की एकादशी भी विशेष मानी जाती है जिसे अचला व अपरा एकादशी भी कहते हैं। 2015 मे अचला एकादशी का व्रत आज यानि 14 मई, गुरुवार को है। पुराणों के अनुसार अचला एकादशी का व्रत समस्त पापों को नष्ट करने वाला होता है। इस व्रत को करने से व्यक्ति को अपार धन संपदा प्राप्त होती है।  

कथा 

प्राचीन काल में महीध्वज नामक राजा थे।  वे बड़े ही धर्मात्मा पुरुष थे लेकिन उनका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वज्रध्वज अपने बड़े भाई बहुत द्वेष करता था। इसी द्वेष के चलते एक दिन अवसर पाकर वज्रध्वज ने घिनोना पाप कर दिया।  एक रात्रि  उसने अपने बड़े भाई यानि राजा महीध्वज की हत्या कर दी और पाप को छुपने के लिए उनकी शरीर को एक जंगली पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु  के कारण राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक तरह से उत्पात करने लगा। 

एक दिन धौम्य ॠषि उस रास्ते से निकले जहाँ प्रेतात्मा का वास था । अपने तपोबल से ऋषि ने प्रेत को देखा और उसका अतीत भी जान लिया। ऐसे पुण्यात्मा राजा की इस दशा को देख ॠषि ने उस प्रेत को परलोक विद्या का उपदेश दिया। दयालु ॠषि ने राजा को प्रेत योनि से मुक्त कराने के लिए स्वयं अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और प्रेत योनि से छुड़ाने के लिए व्रत का पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा महीध्वज की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ॠषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर स्वर्ग को चले गए । 

ऋषि द्वारा व्रत करने मात्र से ही राजा की प्रेत योनि से मुक्ति  हो सकती है तो जो कोई स्वयं ये अचला एकादशी का उपवास रखेगा उसकी सभी दुखो के मुक्ति हो जाएगी। 


No comments:

Post a Comment