Friday, 24 April 2015

मीडिया का असंवेदनशील चेहरा - मीडियाकर्मी किसान गजेन्द्र द्वारा फेंके गए सुसाइड नोट को झपटने में व्यस्त दिखे

आम आदमी पार्टी की रैली की दौरान किसान गजेन्द्र द्वारा फांसी लगाने की घटना ने देश में एक रोष पैदा कर दिया है| इस घटना के दौरान मीडिया का असंवेदनशील चेहरा सामने आया| मीडियाकर्मी किसान गजेन्द्र द्वारा फेंके गए सुसाइड नोट को झपटने में व्यस्त दिखे| अपने को देश का चौथा स्तम्भ कहने वाली मीडिया का यह बर्ताव निंदनीय है|
इस घटना के बाद से सभी न्यूज़चैनल  अपनी तरह से ख़बरों को दिखा रहे हैं| कोई किसी नेता की गलती बता रहा है तो कोई किसी पार्टी की गलती| लेकिन ये न्यूज़ चैनल वाले अपनी गलती क्यों नहीं बताते हैं? क्या इन लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं थी? किसी भी न्यूज़ को कवर करने के लिए ये न्यूज़ चैनल अपने संवाददाताओं की पूरी फौज भेज देते हैं लेकिन ये फ़ौज भी मूकदर्शक बनकर क्यों खड़ी रही?
दिल्ली के हिंदुस्तान अख़बार में छपी एक खबर के बीच में सिर्फ एक लाइन में इस बात को माना गया कि मीडियाकर्मी गजेन्द्र द्वारा फेंके गए सुसाइड नोट को झपटने में व्यस्त दिखे|

 Image Courtesy - Hindustan (Hindi), Delhi के e-paper से Screenshot


इसके अलावा किसी भी न्यूज़ चैनल या अख़बार में इस बात का जिक्र तक नहीं किया गया है| मीडियाकर्मी  अपनी न्यूज़ बनाने के चक्कर में यह भी भूल गए कि एक इंसान मर चुका है बल्कि उसके द्वारा फेंके गए सुसाइड नोट को झपटने लग गए|
 मीडिया किसी भी खबर को इस तरह से दिखाता है जैसे मीडिया ही जज हो और उसने न्याय कर दिया है| अपनी सोच के अनुसार खबर को दिखाया जाता है| 
मीडिया को एक बार यह सब सोचना चाहिए कि हम देश को किस दिशा में ले जा रहे हैं?

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