Thursday, 5 March 2015

होलिका दहन

होलिका दहन

होलिका दहन पूर्ण चंद्रमा (पूर्णिमा) के दिन होता है। इस दिन सायंकाल को होली जलाई जाती है। एक माह पूर्व अर्थात् माघ पूर्णिमा को 'एरंड' या गूलर वृक्ष की टहनी को गाँव के बाहर किसी स्थान पर गाड़ दिया जाता है और उस पर लकड़ियाँ, सूखे उपले, खर-पतवार आदि चारों से एकत्र किया जाता है और फाल्गुन पूर्णिमा की रात या सायंकाल इसे जलाया जाता है, सभी लोग इस अलाव के चारों ओर एकत्रित होते हैं। होली की अग्नि में सूखी पत्तियाँ, टहनियाँ, व सूखी लकड़ियाँ डाली जाती हैं, तथा लोग इसी अग्नि के चारों ओर नृत्य व संगीत का आनन्द लेते हैं। बसंतागमन के लोकप्रिय गीत भक्त प्रहलाद की रक्षा की स्मृति में गाये जाते हैं ।

धार्मिक आस्था

कई समुदायों में होली में जौ की बालियाँ भूनकर खाने की परंपरा है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि आगामी फ़सल कैसी होगी, इसका अनुमान होली की शिखाएँ किस ओर उड़ रही हैं तथा भुने हुए जौ के दानों के रंग व स्वाद से लगाया जा सकता है। होली के अलाव की राख में कुछ औषधि गुण भी पाए जाते हैं, ऐसी लोगों की धारणा है। लोग होली के अलाव अंगारों को घर ले जाते हैं तथा उसी से घर में महिलाएँ होली पर बनाई हुई गोबर की घुरघुली जलाती हैं। कुछ क्षेत्रों में लोग होली की आग को साल भर सुरक्षित रखते हैं और इससे चूल्हे जलाते हैं।

इतिहास

प्रचलित मान्यता के अनुसार यह त्योहार प्रहलाद की भक्ति और हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के मारे जाने की स्मृति में मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार, हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को एक वरदान प्राप्त था जिसके कारण वह अग्निस्नान कर सकती थी और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपने राज्य में यह घोषणा की थी कि समस्त प्रजा उसे ही अपना भगवान/इष्ट  माने और उसकी पूजा करे जबकि उसका अपना पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को समाप्त करने के कई प्रयत्न किए, किंतु प्रत्येक बार भगवान की कृपा से वह बच जाता । तब हिरण्यकशिपु ने बहन होलिका से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्निस्नान करने को कहा। उसने समझा कि ऐसा करने से प्रह्लाद तो अग्नि में जल जाएगा लेकिन वरदान के कारण होलिका को कुछ नहीं होगा। होलिका ने ऐसा ही किया, किंतु इस बार भी श्री हरि की कृपा से प्रह्लाद तो बच गया, लेकिन होलिका जलकर भस्म हो गई। होलिका को यह स्मरण ही नहीं रहा कि अग्नि स्नान वह अकेले ही कर सकती है। तभी से इस त्योहार के मनाने की प्रथा चल पड़ी। 

दहन विधि

'होलिका पूजन' के समय सभी को एक लोटा जल, कुमकुम, चावल, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूँग, बताशे, गुलाल और नारियल आदि से पूजन करना चाहिए। सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका में अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी जाती है। अग्नि प्रज्ज्वलित होते ही डंडे को बाहर निकाल लिया जाता है। होलिका के चारों ओर कच्चे सूत को सात या तीन परिक्रमा करते हुए लपेटा जाता है। तत्पश्चात लोटे का शुद्ध जल व अन्य पूजन की सभी वस्तुओं को एक-एक करके होलिका को समर्पित किया जाता है। कुमकुम, चावल व पुष्प का पूजा में उपयोग किया जाता है। सुगंधित‍ फूलों का प्रयोग कर पंचोपचार विधि से होलिका का पूजन करके पूजन के बाद जल से अर्ध्य दिया जाता है।

होलिका पूजन के समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करना चाहिए-

"अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः 
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम्‌।"



होलिका दहन होने के बाद होलिका में वस्तुओं की आहुति दी जाती है, उनमें प्रमुख तौर पर कच्चे आम, नारियल, सात प्रकार के धान्य यानी गेहूँ, उड़द, मूँग, चना, जौ, चावल और मसूर आदि सात धान्यों से होलीका पूजन किया जाता है। इस पूजन के समय ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि आपका मुँह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखकर ही पूजा में उपरोक्त सामग्री का प्रयोग करें। साथ ही होली के समय आने वाली नई फ़सलों के धान्य को ख़ासकर होली में अर्पित करके पूजन किया जाता है और अच्छे धन-धान्य और अच्छे जीवन की माँग की जाती है।

सार्वजनिक होली से अग्नि लाकर घर में बनाई गई होली में अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है। अंत में सभी पुरुष कुमकुम का टीका लगाते है और महिलाएँ होली के गीत गाती हैं। इस दिन घर के बुजुर्गों के चरण छूकर मंगलमय जीवन का आशीर्वाद लिया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार होली की बची हुई अग्नि और राख को अगले दिन सुबह घर में लाने से घर का और परिवार के सभी सदस्यों का अशुभ शक्तियों से बचाव होता है।

इस पर्व को 'नवान्नेष्टि यज्ञपर्व' भी कहा जाता है, क्योंकि खेत से आये नवीन अन्न को इस दिन यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने की परम्परा भी है। उस अन्न को होला कहते है। इसी से इसका नाम 'होलिकोत्सव' पड़ा। होली का समय अपने आप में अनूठा ही है। फ़रवरी- मार्च में जब होली मनाई जाती है, तब सब ओर चिंतामुक्त वातावरण होता है- किसान फ़सल कटने के बाद आश्वस्त होता है। पशुचारा तो संगृहित किया जा चुका होता है। शीत ऋतु अपने समापन पर होती है। दिन न तो बहुत गर्म, न ही रातें बहुत ठंडी होती हैं। होली फाल्गुन मास में पूर्ण चंद्रमा के दिन मनाई जाती है। यद्यपि यह उत्तर भारत में एक सप्ताह व मणिपुर में छह दिन तक मनाई जाती है। होली वर्ष का अंतिम तथा जनसामान्य का सबसे बड़ा त्योहार है। सभी लोग आपसी भेदभाव को भुलाकर इसे हर्ष व उल्लास के साथ मनाते हैं। होली पारस्परिक सौमनस्य एकता और समानता को बल देती है। विभिन्न देशों में इसके अलग-अलग नाम और रूप हैं। होलिका की अग्नि में पुराना वर्ष 'जो होली' के रूप में जल जाता है और नया वर्ष नयी आशाएँ, आकांक्षाएँ लेकर प्रकट होता है। मानव जीवन में नई ऊर्जा, नई स्फूर्ति का विकास होता है।




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