Thursday, 12 March 2015

क्या है मणिकरण का राज़

मणिकरण एक पवित्र धार्मिक स्थल है। यह 1737 मीटर की ऊंचाई पर स्थित, कुल्लू से 45 कि.मी दूर हिमाचल राज्य में है। मणिकरन कुल्लू जिले के भुंतर से उत्तर पश्चिम में पार्वती घाटी में व्यास और पार्वती नदियों के मध्य बसा है।   मणिकरण का अर्थ है "बहुमूल्य रत्न"। मणिकरण से जुड़ी कई प्राचीन मान्यताएं भी हैं। इसलिए लोग धार्मिक यात्राओं के लिए भी यहां आते हैं। मणिकरण एक ऐसी ही जगह है जहां की प्राचीन मान्यता शेषनाग और भगवान शिव से जुड़ी है। कहा जाता है कि शिव के क्रोध से बचने के लिए शेषनाग ने एक दुर्लभ मणि फेंकी थी। इससे यहां एक अद्भुत चमत्कार हुआ।

मणिकर्ण में एक ऐसी जगह है जहां हमेशा उबलता हुआ पानी बाहर निकलता है। मान्यता है कि यहीं पर शेषनाग ने भगवान शिव के क्रोध से बचाव के लिए वह मणि फेंकी थी। शेषनाग ने मणि क्यों फेंकी, इसके पीछे भी एक प्राचीन कथा है।

मान्यतानुसार मणिकर्ण स्थान पर भगवान शिव और मां पार्वती ने हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। एक बार जब पार्वती जल स्रोत में स्नान कर रही थीं तो उनके कान के गहने की मणि पानी में गिर गई। स्नान के बाद जब मणि नहीं मिली तो मां पार्वती ने भगवान शिव से कहा और शिव ने अपनों गणों को आदेश दिया कि वे मणि को तलाश कर लाएं।

शिव के गण मणि ढूंढने निकले लेकिन बहुत प्रयत्न करने के बाद भी उन्हें मणि नहीं मिली। तब शिव क्रोधित हुए। उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला तो नैना देवी नाम से शक्ति का उद्भव हुआ। नैना देवी ने अपनी दिव्य दृष्टि से बताया कि यह दुर्लभ मणि शेष नाग के पास है जो पाताल लोक में हैं।

तब देवताओं और शिव के गणों ने शेषनाग से निवेदन किया कि वे मणि मां पार्वती को लौटा दें। शेषनाग ने मां पार्वती को मणि लौटा दी और जोर से फुंकार भरी। इससे उस स्थान पर गर्म पानी की धारा निकली। कहा जाता है कि शिव के क्रोध से डरकर शेष नाग ने मणि लौटाते वक्त जो फुंकार मारी, उसके बाद आज भी यहां बिल्कुल गर्म पानी की धारा निकल रही है। इसका पानी इतना गर्म है कि आलू, चावल और दूसरे खाद्यान्न मिनटों में पक जाते हैं। हर साल यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं और शिव की कृपा से कुदरत के इस अद्भुत नजारे को नमस्कार करते हैं।


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