Tuesday, 17 February 2015

महाशिवरात्री की कथा और महत्व

शिवरात्रि हिन्दुओ का एक बहुत महत्वपूर्ण त्योहार है जो फाल्गुन महीने मे मनाया जाता है। हर जगह हरियाली छा जाती है, सर्दी का मौसम समाप्त होता है| धरती फिर से फूलों में समाने लगती है| ऐसा लगता है कि पृथ्वी में फिर से जान आ गई है| सारे भारत में शिवलिंग की पूजा होती है जो कि रचना की प्रतीक है|  इसदिन लोग व्रत रखते है और सारी रात मन्दिरों मे भगवान शिव का भजन होता है| सुबह भक्त नहा धोकर शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाते है और  ॐ नमःशिवाय का जाप करते हैं।  महाशिवरात्रि के उत्सव पर औरतें अपने पति और पुत्र की शुभ मंगल कामना करती हैं तथा  क्वारी लड़कियाँ अच्छा पति पाने के लिए भगवान शिव का पूजन करती हैं ।  

पुराणों में बहुत सी कथाएँ मिलती हैं | एक कथा समुद्र मंथन की है |  समुद्र मंथन के समय जब समुन्द्र से विष निकला, सब देवी देवता डर गये और संसार को तबाही से बचाने के लिए शिवजी के पास गए। शिव ने सारा विष पी लिया और विष को अपने गले मे समा लिया, शिवजी का गला नीला हो गया और उसे नीलकंठ का नाम दिया गया| शिव ने दुनिया को बचा लिया, शिवरात्रि इसलिये भी मनाई जाती है|

महाशिवरात्री की प्रसिद्ध कथा

पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी जानवरों की हत्या करके अपना व अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था। समय पर ऋण न चुका पाने के कारण क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

ऋण चुका सके इसलिए वह जंगल में शिकार के लिए गया लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण वह भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया लेकिन जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। अतः वह वन मे एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा। उसी पेड़ के नीचे एक शिवलिंग जमीन मे दबा हुआ था ।

कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया और कहा कि वह उसे छोड़ दे और पति से मिलकर शीघ्र ही वह उसके पास आ जाएगी।' उसकी विनती सुन, शिकारी ने उसे भी जाने दिया परंतु बहुत समय तक शिकारी के हाथ कोई शिकार न लगा तो वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था और अंजाने मे ही धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई।

तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली, 'हे शिकारी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो। शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्याकुल हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करों, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, क्यूंकी मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा। मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो गई और उपवास, रात्रि-जागरण तथा अनजाने में ही शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला और शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया; उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके।, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं। वास्तव में वह शिकारी शिव पूजन नहीं कर रहा था अर्थात वह किसी भी तरह के किसी फल की कामना भी नहीं कर रहा था। उसने मृग परिवार को समय एवं जीवन दान दिया जो कि शिव पूजन के समान है। शिव का अर्थ ही कल्याण होता है। उन निरीह प्राणियों का कल्याण करने के कारण ही वह शिव तत्व को जान पाया तथा उसका शिव से साक्षात्कार हुआ।


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