Thursday, 15 January 2015

मकर संक्रांति

ख़ुशी और समृद्धि का प्रतीक मकर संक्रांति त्यौहार सूर्य के धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करने का दिन है। इसी दिन से सूर्य की उत्तरायण गति आरंभ होने के कारण इसको उत्तरायणी भी कहते हैं। शास्त्रों में यह समय देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। मकर संक्रांति देवताओं का प्रभात काल है। इस दिन स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध और अनुष्ठान आदि का महत्व है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुणा होकर लौटता है। इसलिए भगवान चतुर्भुज का अर्घ्य सहित पूजन कर घी, तिल, कंबल और खिचड़ी दान किया जाता है। स्नान पुण्य के साथ-साथ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी मकर संक्रांति को लाभदायक माना गया है। मकर संक्रांति की प्रसिद्ध गाथाएँ : इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा उनसे मिली थीं। महाभारत काल के महान योद्धा भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। भारतवर्ष के विभिन्न प्रान्तों में यह त्यौहार अलग-अलग नाम और परम्परा के अनुसार मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, असम में बिहू और दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग खिचड़ी बनाकर भगवान सूर्यदेव को भोग लगाते हैं, जिस कारण यह पर्व खिचड़ी के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस दिन सुबह सुबह पवित्र नदी में स्नान कर तिल और गुड़ से बनी वस्तु को खाने की परंपरा है। इस पवित्र पर्व के अवसर पर पतंग उड़ाने का अलग ही महत्व है। बच्चे पतंगबाजी करके ख़ुशी और उल्लास के साथ इस त्यौहार का भरपूर लुत्फ़ उठाते हैं।

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