Tuesday, 4 November 2014

भारत के स्वतन्त्रता सेनानी वासुदेव बलवंत फड़के

वासुदेव बलवंत फडके (4 नवम्बर, 1845 – 17 फरवरी, 1883) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे जिन्हें आदि क्रांतिकारी कहा जाता है। जिनका केवल नाम लेने से युवकों में राष्ट्रभक्ति जागृत हो जाती थी । वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आद्य क्रांतिकारी थे ।

स्वतंत्र भारत के इस मन्दिर की नींव में पड़े हुए असंख्य पत्थरों को कौन भुला सकता है जो स्वयं स्वाहा हो गए किन्तु भारत के इस भव्य और स्वाभिमानी मंदिर की आधारशिला बन गए। ऐसे ही एक गुमनाम पत्थर के रूप में थे, बासुदेव बलवन्त फड़के, जिन्होंने 1857 की प्रथम संगठित महाक्रांति की विफलता के बाद आजादी के महासमर की पहली चिंगारी जलायी थी। बासुदेव महाराष्ट्र के कालवा जिले के श्रीधर ग्राम में जन्मे थे। बासुदेव के पिता चाहते थे कि वह एक व्यापारी की दुकान पर दस रुपए मासिक वेतन की नौकरी कर लें, पढ़ाई छोड़ दें, किन्तु बासुदेव ने यह बात नहीं मानी और मुम्बई आ गए। वहाँ पर जी.आर.पी. में बीस रुपए मासिक की नौकरी करते हुए, अपनी पढ़ायी जारी रखी।

उन्हीं दिनों 1870 में महाराष्ट्र स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख नेता न्यायमूर्ति रानाडे का मुम्बई में भाषण सुनकर बासुदेव प्रभावित हुए। 1871 में एक दिन सायंकाल वे कुछ गंभीर विचार में बैठे थे तभी उनकी माताजी की तीव्र अस्वस्थता का तार उनको मिला। इस वेदनापूर्ण तार को पढ़कर वे तार लेकर अंग्रेज अधिकारी के पास अवकाश का प्रार्थना पत्र देने गए, किन्तु अंग्रेज तो भारतीयों को अपमानित करने के लिए सतत् प्रयासरत रहते थे। उस अंग्रेज अधिकारी ने अवकाश नहीं दिया, किन्तु बासुदेव दूसरे दिन अपने गांव-चले गए। वहाँ पहुंचकर बासुदेव पर वज्राघात हुआ। जब उन्होंने देखा कि उनका मुंह देखे बिना तड़पते-तड़पते उनकी ममतामयी मां चल बसी तो अंग्रेजी शासन के दुव्यर्वहार से उनका हृदय चीत्कार कर उठा।

उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर नवयुवकों से विचार-विमर्श किया और उन्हें संगठित करने का प्रयास किया। किन्तु उन्हें नवयुवकों के व्यवहार से आशा की कोई किरण दिखायी नहीं पड़ी। कुछ दिनों बाद गोविन्द राव दावरे तथा कुछ अन्य युवक उनके साथ खड़े हो गए। फिर भी कोई शक्तिशाली संगठन खड़ा होता नहीं दिखायी दिया। तब उन्होंने वनवासी जातियों की ओर नजर उठायी और सोचा आखिर भगवान श्रीराम ने भी तो वानरों और वनवासी समूहों को संगठित करके लंका पर विजय पायी थी। महाराणा प्रताप ने भी इन्हीं वनवासियों को ही संगठित करके अकबर को नाको चने चबवा दिए थे शिवाजी ने भी इन्हीं वनवासियों को स्वाभिमान की प्रेरणा देकर औरंगजेब को हिला दिया था। भारत माता की सेवा के लिए बासुदेव ने सब कुछ त्याग दिया और अपनी सेना बनाने लगे। रोमोशी जनजाति के तमाम विश्वस्त, सिद्धहस्त लोग इस लड़ाकू सेना में शमिल हो गए।

महाराष्ट्र के सात जिलों में बासुदेव की सेना का जबर्दस्त प्रभाव फैल चुका था। अंग्रेज अफसर डर गए थे। इस कारण एक दिन मंत्रणा करने के लिए विश्राम बाग में इकट्ठा थे। वहाँ पर एक सरकारी भवन में बैठक चल रही थी। 13 मई, 1879 को रात 12 बजे बासुदेव अपने साथियों सहित वहाँ आ गए, अंग्रेज अफसरों को मारा तथा भवन को आग लगा दी। उसके बाद अंग्रेज सरकार ने उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर पचास हजार रुपए का इनाम घोषित किया। किन्तु दूसरे ही दिन मुम्बई नगर में बासुदेव के हस्ताक्षर से इश्तहार लगा दिए गए कि जो अंग्रेज अफसर रिचर्ड का सिर काटकर लाएगा उसे 75 हजार रुपए का इनाम दिया जाएगा। अंग्रेज अफसर इससे बौखला गए। अन्ततोगत्वा एक दिन बासुदेव अपने एक मित्र के घर से गिरफ्तार कर लिए गए। और 31 अगस्त 1879 को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। बचाव में बासुदेब बलवन्त फड़के ने कहा कि भारतवासी आज मृत्यु के मुहाने पर खड़े हैं, परतंत्रता की इस लज्जापूर्ण स्थिति से मर जाना ही श्रेयस्कर है, मैं भगवान या सरकार से नहीं डरता क्योंकि मैंने कोई पाप नहीं किया है। दधीचि की तरह मैं अपने जीवन का बलिदान देकर अगर भारत की गुलामी की पीड़ा को थोड़ा भी कम कर सका तो अपने को धन्य समझूंगा।

आजीवन कारावास के जेल जीवन में बासुदेव ने सोचा कि क्या मेरा जन्म जेल में सड़ने के लिए हुआ है? एक रात कड़े पहरे के बीच जेल की दीवार फांदकर भाग गए। शक्तिहीनता की शारीरिक स्थिति में भी 17 मील तक बासुदेव भागते रहे। पीछा कर रही पुलिस से वे बच नहीं पाए और पुन: जेल भेज दिए गए। इस बार जेल के अधिकारी ने कठोर यातानाएं दीं। परिणाम स्वरूप 17 फरवरी, 1883 ई. को अदन की जेल में वीर बासुदेव बलवन्त फड़के ने अपना शरीर छोड़ दिया। उनकी मृत्यु पर प्रसिद्ध स्वदेशी नेता न्यायमूर्ति रानाडे ने कहा था कि बासुदेव बलवन्त फड़के ने देश की बलिवेदी पर अपने जीवन का सर्वस्व बलिदान कर दिया।

साप्ताहिक पाञ्चजन्य से साभार

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