Monday, 3 November 2014

देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह

आज (3 नवंबर, सोमवार) देवउठनी एकादशी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु नींद से जागते हैं। इसी दिन से शुभ कार्यों की शुरुआत भी होती है। देवउठनी एकादशी से जुड़ी कई परंपराएं हैं। ऐसी ही एक परंपरा है तुलसी-शालिग्राम विवाह की। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार तुलसी का पति शंखचूड़ नामक असुर था। तुलसी के सतीत्व के कारण देवता भी उसे मार पाने में असमर्थ थे।

तब भगवान विष्णु तुलसी के पास शंखचूड़ का रूप बनाकर पहुंच गए। तुलसी भी भगवान की माया समझ नहीं पाई। तुलसी का सतीत्व भंग होते ही महादेव ने शंखचूड़ का वध कर दिया। जब तुलसी को यह बात पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। भगवान विष्णु ने तुलसी के श्राप को स्वीकार किया और कहा कि तुम पृथ्वी पौधे तथा नदी के रूप में रहोगी।

धर्मालुजन तुम्हारा और मेरा विवाह करवाकर पुण्य लाभ अर्जित करेंगे। गंडकी नदी व तुलसी का पौधा तुलसी का ही रूप है तथा गंडकी नदी में में पाई जाने वाली शालिग्रााम शिला को ही भगवान विष्णु माना जाता था। प्रतिवर्ष धर्मालुजन देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी-शालिग्राम विवाह कर धर्मलाभ लेते हैं। ऐसी मान्यता है कि तुलसी विवाह के संकल्प और उसे पूरा करने से व्यक्ति सुखी और समृद्ध होता है।

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