Friday, 14 November 2014

आज है इनकी पुण्यतिथि

डॉक्टर हरिकृष्‍ण देवसरे


डॉक्टर हरिकृष्‍ण देवसरे का जन्म 9 मार्च, 1938 को मध्य प्रदेश के नागोद मे हुआ । देवसरे का नाम हिंदी साहित्य के अग्रणी लेखकों में था और बच्चों के लिए रचित उनके साहित्य को विशेष रूप से पसंद किया गया। बच्चों के लिए लेखन के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2011 में साहित्य अकादमी बाल साहित्य लाइफटाइम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 300 से अधिक पुस्तकें लिख चुके देवसरे को बाल साहित्यकार सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बाल साहित्य सम्मान, कीर्ति सम्मान (2001) और हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान (2004) सहित कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। देवसरे देश के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बाल साहित्य में डाक्टरेट की उपाधि हासिल की थी।

उन्होंने भारतीय भाषाओं में रचित बाल-साहित्य में रचनात्मकता पर बल दिया और बच्चों के लिए मौजूद विज्ञान-कथाओं और एकांकी के ख़ालीपन को भरने की कोशिश की। देवसरे ने 1960 में कार्यक्रम अधिशासी के रूप में आकाशवाणी से अपना करियर शुरू किया और 1984 तक विभिन्न विषयों पर महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का निर्माण और प्रसारण किया। वे करीब 22 साल तक आकाशवाणी से जुड़े रहे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद बच्‍चों की लोकप्रिय पत्रिकापराग पत्रिका का 10 वर्ष संपादन किया था। डॉक्टर हरिकृष्ण देवसरे ने धारावाहिकों, टेलीफिल्मों और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर आधारित कार्यक्रमों के लिए कहानी भी लिखी। इनहोने कई किताबों का अनुवाद किया।

हरिकृष्ण देवसरे के उपन्यास

1968 खेल बच्‍चे का
1969 आओ चंदा के देश चलें
1969 मंगलग्रह में राजू
1971 उड़ती तश्‍तरियां
1981 स्‍वान यात्रा
1981 लावेनी 52
1983 सोहराब रुस्‍तम
1983 आल्‍हा ऊदल
1983 गिरना स्‍काइलैब का
1984 डाकू का बेटा
2003 दूसरे ग्रहों के गुप्‍तचर

हरिकृष्ण देवसरे का 14 नवंबर 2013 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 75 साल के थे।

सी के नायडू


कोट्टारी कंकैया नायडु (सी के नायडू) का जन्म 13 अक्टूबर, 1895 ई. को नागपुर, महाराष्ट्र में हुआ था। भारत की क्रिकेट टीम के प्रथम टेस्ट मैच मे वे भारतीय टीम के कप्तान थे। सी. के. नायडू उस उम्र तक क्रिकेट खेलते रहे, जिसके बारे में सोचना भी आज के खिलाड़ियों के लिए दिवास्वप्न है। नायडू की उस समय की फिटनेस आज के उन खिलाड़ियों के लिए एक सबक है, जो दूसरे तीसरे मैच के बाद ही चोटिल हो जाते हैं। 37 साल की उम्र में जब आज खिलाडी रिटायर होने लगते है, तब सी. के. नायडू ने टेस्ट मैंच खेलना शुरू किया था। वह 68 साल तक फिट रहकर क्रिकेट खेलते रहे थे।

वर्ष 1926-1927 में उन्होंने ख़ासी लोकप्रियता प्राप्त की, जब उन्होंने बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में 100 मिनट में 187 गेंदों पर 153 रन बना दिए, जिनमें 11 छक्के तथा 13 चौके शामिल थे। यह मैच 'हिन्दू' टीम तरफ से ए. ई. आर. गिलीगन की एम. सी.सी. के विरुद्ध खेल रहे थे। बम्बई के जिमखाना मैदान पर 'हिन्दू' टीम के लिए उनकी आखिरी पारी पर उन्हें चाँदी का बल्ला भी भेंट किया गया था। क्रिकेट जब अभिजात्य और राजा महाराजाओं का खेल हुआ करता था, तब उन्हें इग्लैंड जा रही भारतीय टीम का कप्तान बनाया जाना एक प्रसंग ही था।

सी. के. नायडू ने 'आंध्र प्रदेश केन्द्रीय भारत', 'केन्द्रीय प्रोविंसज एंड बरार', 'हिन्दू', 'होल्कर यूनाइटेड प्राविंस' तथा भारतीय टीमों के लिए क्रिकेट खेला। 1932 में इंग्लैंड दौरे के दौरान सी. के. नायडू ने प्रथम श्रेणी के सभी 26 मैचों में हिस्सा लिया था, जिनमें 40.45 की औसत से 1618 रन बनाए और 65 विकेट लिए। 1933 में सी. के. नायडू को विज़डन द्वारा 'क्रिकेटर ऑफ़ द ईयर' चुना गया था। सी. के. नायडू के नाम किसी एक सीज़न में इंग्लैंड में सर्वाधिक छक्के (किसी विदेशी खिलाड़ी द्वारा) लगाने का रिकार्ड भी है। 1932 में सी. के. नायडू ने कमाल का खेल दिखाते हुए 32 छक्के लगाए थे। यद्यपि सी. के. नायडू का अंतरराष्ट्रीय कैरियर बहुत छोटा रहा। उन्होंने मात्र 7 टैस्ट मैच खेले, लेकिन भारतीय क्रिकेट जगत में उन्होंने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया। उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 1956 में 'पद्मभूषण' प्रदान किया गया था, जो भारत का तीसरा बड़ा राष्ट्रीय पुरस्कार है।

भारतीय क्रिकेट को नई ऊँचाईयाँ दिलाने वाले सी. के. नायडू का देहांत 14 नवम्बर, 1967 को इन्दौर में हुआ।

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