Friday, 7 November 2014

पुण्यतिथि पर इन्हे दें श्रद्धांजलि


चिदम्बरम सुब्रह्मण्यम का जन्म जनवरी, 1910 को कोयम्बटूर ज़िले के 'पोलाची' नामक स्थान पर हुआ था। इनको भारत में हरित क्रांति का पिता कहा जाता है। जब भारत को आज़ादी प्राप्त हुई, उस समय देश में खाद्यान्न उत्पादन की स्थिति बड़ी शोचनीय थी। कई स्थानों पर अकाल पड़े। बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में अनेक लोग भुखमरी के शिकार हुए और काल का ग्रास बन गये। जब सी. सुब्रह्मण्यम को केन्द्र में कृषि मंत्री बनाया गया, तब उन्होंने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्म-निर्भर बनाने के लिए अनेक योजनाएँ क्रियान्वित कीं। उनकी बेहतर कृषि नीतियों के कारण ही 1972 में देश में रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन हुआ। सी. सुब्रह्मण्यम की नीतियों और कुशल प्रयासों से ही आज देश खाद्यान्न उत्पादन में पूर्ण रूप से आत्म-निर्भर हो चुका है।

सी. सुब्रह्मण्यम को तुलसी फाउण्डेशन के अतिरिक्त 'ऊ थांट' शांति पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रीय एकता के लिए कार्य करने के कारण उन्हें 'वाइ.एस. चौहान' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिर उन्हें सर्वोच्च भारतीय सम्मान 'भारत रत्न' से 1988 में सम्मानित किया गया।

आज ही के दिन यानि 7 नवम्बर, 2000 में सुब्रह्मण्यम जी का निधन हुआ।


जीवराज मेहता का जन्म बड़ौदा रियासत के अमरेली कस्बे में 29 अगस्त, 1887 ई. को एक ग़रीब परिवार में हुआ था। छात्रवृत्ति और ट्यूशन करके जीवराज ने अपनी शिक्षा जारी रखी थी। वे बड़े प्रतिभाशाली छात्र थे। मुंबई के 'ग्रांट मेडिकल कॉलेज' की पढ़ाई में उन्हें आठ में से सात विषयों में छात्रवृत्ति और पुरस्कार मिले थे। आठवें विषय का आधा पुरस्कार भी उन्हीं के हिस्से में आया।

वे भारत के एक प्रमुख चिकित्सक और देश सेवक थे। इन्हें गुजरात राज्य का प्रथम मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। इन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही 'इण्डियन एसोसिएशन' का गठन किया था। यहीं इनका सम्पर्क राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से हुआ और ये गाँधी जी के सहयोगी बन गये। गाँधी जी अपना हर चिकित्सीय परामर्श डॉस्टर जीवराज मेहता से ही लिया करते थे। गाँधी जी और मेहता जी का यह सम्बन्ध जीवन पर्यन्त बना रहा था।

देश की अमूल्य सेवा करने वाले इस महान व्यक्तित्व का 7 नवम्बर, 1978 ई. को निधन हुआ।


अश्विनी कुमार दत्त का जन्म का जन्म 15 जनवरी, 1856 ई. को बारीसाल ज़िला (पूर्वी बंगाल) में हुआ था।

ये भारत के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और देश भक्त थे। एक अध्यापक के रूप में उन्होंने अपना व्यावसायिक जीवन प्रारम्भ किया था। उन्होंने वर्ष 1886 में कांग्रेस के दूसरे कोलकाता अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था।

ब्रह्म समाजी विचारों के अश्विनी कुमार दत्त 'गीता', 'गुरु ग्रंथ साहिब' और 'बाइबिल' का श्रद्धा के साथ पाठ करते थे। वे समाज सुधारों के पक्षधर थे और छुआछूत, मद्यपान आदि का सदा विरोध करते रहे। अपने समय में पूर्वी बंगाल के बेताज बादशाह माने जाने वाले अश्विनी कुमार दत्त का 7 नवम्बर, 1923 ई. में देहांत हो गया।

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