Monday, 3 November 2014

नेहरू के आकलन की आवशयकता

कांग्रेस को विस्मय में डालते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन चार तारीखों को एक तरह से हथिया लिया है जो राजनीतिक रूप से कांग्रेस के लिए महत्त्वपूर्ण रही हैं। ये चारों तिथियां अक्टूबर और नवंबर में पड़ती हैं। पहली तारीख है 2 अक्टूबर यानी महात्मा गांधी की जन्मतिथि। मोदी ने उस दिन स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की। कांग्रेस के लिए अधिक कष्टदायी बात यह रही कि उसके विरोध के बीच भी लोगों ने इसे सराहा।

अगली तीन सप्ताह के भीतर पड़ने वाली तिथियाँ मे - 31 अक्टूबर यानी सरदार पटेल का जन्मदिन और इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि । लेकिन इस बार मोदी ने इन्दिरा गांधी की पुण्यतिथि को दरकिनार करते हुए सरदार पटेल के जन्मदिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप मे घोषित कर दिया जबकि 1985 से पटेल के जन्मदिन पर इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि हावी हो गई थी। 14 नवंबर जो देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की जन्मतिथि तथा 19 नवंबर जो इंदिरा गांधी की जन्मतिथि है, उस सप्ताह को भी मोदी ने साफ-सफाई अभियान को समर्पित करने का ऐलान किया है।

ये चारों नेता कांग्रेस के सदस्य थे। इन सभी के लिए भारतीयों के मन में गहरा सम्मान है। बहरहाल इंदिरा गांधी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने पार्टी को चापलूसों की निजी सेना में बदल दिया था जबकि बाकी तीन ने कांग्रेस को श्रेष्ठता प्रदान की। उपरोक्त चारों नेताओं में दो यानि गांधी और पटेल की मृत्यु सन 1947 में आजादी मिलने के तीन साल के भीतर हो गई थी। ऐसे में स्वाभाविक है कि इतिहासकारों ने उनकी भूमिका का आकलन केवल आजादी की लड़ाई को ध्यान में रखकर ही किया। इंदिरा गांधी की आजादी की लड़ाई में कोई भूमिका नहीं थी। ऐसे में केवल नेहरू ही बचते हैं जिन्होंने आजादी के पहले 30 सालों तक और आजादी के बाद 17 सालों तक राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाई। ऐसे में इतिहासकारों, राजनीतिविज्ञानियों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों ने उनका जमकर विश्लेषण किया। कुछ ने तो नेहरू पर बतौर प्रधानमंत्री ही ध्यान दिया है जबकि इतिहासकारों ने उन्हें बतौर राष्ट्रवादी नेता और प्रधानमंत्री आंका।

हकीकत यह है कि दो नेहरू थे। एक आजादी के पहले और दूसरा सन 1947 के बाद। आजादी के पहले अपने तमाम अन्य सहकर्मियों से इतर वह पार्टी आलाकमान यानी गांधीजी के अनुयायी थे। यकीनन वे समय समय पर बहस भी करते और आपत्ति भी जताते लेकिन अंतत: वे हमेशा उनकी बात मान लेते। आजादी के बाद वह एक आक्रामक नेता के रूप में उभरे जिसे दूसरों से उम्मीद थी कि वे उनकी बात मानेंगे। उन्होंने धीरे-धीरे पूरे प्रतिपक्ष को खत्म कर दिया और अपने चहेतों को नियुक्त किया। कृष्ण मेनन और टी टी कृष्णमाचारी ऐसे ही दो लोग थे। बतौर रक्षा मंत्री मेनन को व्यापक तौर पर सन 1962 में चीन के हाथों पराजय के लिए जिम्मेदार ठहराया गया । टीटीके ने बतौर वित्त मंत्री देश की अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता कर दी। उन्होंने जमकर कर लगाए जबकि मेनन को एक वित्तीय घोटाले के चलते पद त्यागना पड़ा।

यह नेहरू का आजादी के पहले और बाद का रूप और रुख है जिसकी और जांच पड़ताल करनी जरूरी है। उम्मीद है कि अब जबकि कांग्रेस पर उनके वारिसों की पकड़ कमजोर हो रही है और इतिहासकारों के पास भी उनको खुश करने की कोई वजह नहीं है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि कुछ युवा इतिहासकार उनके इन दोनों रूपों को अलग-अलग चश्मे से देखने की कोशिश करेंगे।

जहां तक आजादी के पहले नेहरू की भूमिका का सवाल है तो दो सवाल हैं जिनके जवाब तलाश करना जरूरी है। पहला, नीतिगत मसलों पर क्या वह हमेशा अपनी मान्यताओं पर पूरी तरह आश्रित रहते थे या फिर उन्होंने आला कमान को खुश करने के लिए उनको किनारे कर दिया था। दूसरा, जब बात राजनीतिक चयन की आती थी तो क्या वह व्यवहार में उतने ही धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे जितने कि अपने भाषणों और लेखन में दिखते थे?

मिसाल के तौर पर सन 1937 में जब उनके पास मुस्लिम लीग के रूप में अधिक धर्मनिरपेक्ष विकल्प मौजूद था तो भी उन्होंने जमात जैसे सांप्रदायिक संगठन के साथ गठजोड़ किया। दूसरा - जब उन्होंने लीग पर काफी हद तक नकारात्मक शर्तें थोपीं। जो संदेह पैदा करता है ।

ऐसा क्यों? क्योंकि सबको पता है कि गांधीजी के संरक्षण के बिना तो उस दौर के सभी बड़े नेताओं मसलन पटेल, बोस, अंबेडकर, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, जिन्ना आदि के साथ मतभेदों ने उनके राजनीतिक जीवन को सन 1947 के बहुत पहले ही खत्म कर दिया होता। इन सभी की उनके बारे में कोई अच्छी राय नहीं थी। वह केवल गांधीजी की वजह से बचे रहे और गांधीजी उनको इसलिए पसंद करते थे क्योंकि वह कभी उनके खिलाफ नहीं गए। नेताजी जैसे लोगों ने गांधी जी से मतभेद होने के तत्काल बाद यह समझ लिया कि उनसे गलती हो गई। यहां तक कि मौलाना आजाद और सी राजगोपालाचारी को तो सन 1942 से 45 के दौरान उनकी नाराजगी का सामना भी करना पड़ा। क्या यह महज संयोग ही है कि जिन दो लोगों ने कभी गांधी का विरोध नहीं किया वही उनके सबसे प्रिय थे और आज भी उनका नाम सबसे ज्यादा लिया जाता है। ये दो नाम हैं पटेल और नेहरू के।

via BS

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