Wednesday, 29 October 2014

छठ पर्व : सूर्य देव की आराधना का पर्व

सूर्य हमारी पृथ्वी पर जीवन की वजह है। सूर्य हमारे अस्तित्व के लिए अपरिहार्य है, चाहे जीवन के लिए, ताप, ऊर्जा या फिर भोजन... किसी भी स्तर पर सूर्य की उपस्थिति मानव जीवन और मानव सभ्यता के लिए जरूरी है। और शायद इसीलिए हमारी परंपरा में सूर्य की आराधना शामिल रहती है। चाहे हर दिन सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा हो या फिर सूर्य के उत्तरायण का पर्व मकर संक्राति हो, या फिर छठ...।

छठ पूजा का इतिहास में जगह-जगह वृत्तांत मिल जाएंगें। इसका प्रारंभ महाभारत काल में कुंती की सूर्य आराधना से माना जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।

लोक परंपरा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी।

छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान भी छिपा हुआ है। षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगोलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। इस पर्व के अनुसार सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैंगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा करता है।

कैसे की जाती है छठ पूजा
पूर्वी भारत -बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाने वाला महापर्व छठ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी (सूर्य षष्ठी) को मनाया जाता है । छठ का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसे छठ से दो दिन पहले चौथ के दिन शुरू करते हैं जिसमें दो दिन तक व्रत रखा जाता है। इस पर्व की विशेषता है कि इसे घर का कोई भी सदस्य रख सकता है तथा इसे किसी मन्दिर या धार्मिक स्थान में न मना कर अपने घर के पूजा-घर में प्राकृतिक जल राशि के समक्ष मनाया जाता है। इस अवसर पर घर के सभी सदस्य स्वच्छता का बहुत ध्यान रखते हैं जहां पूजा स्थल होता है वहां नहा धो कर ही जाते हैं यही नहीं तीन दिन तक घर के सभी सदस्य पूजा-घर के सामने जमीन पर ही सोते हैं।

पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, केले की पूरी गढ़, इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ (बिहार में इसे खजूर कहते हैं), नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/ पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो गन्नो के बारह पेड़ आदि।

पहले दिन महिलाएं अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख कर दूसरे दिन आने वाले व्रत की तैयारी करती हैं।

छठ पर्व पर दूसरे दिन व्रत (उपवास) रखा जाता है और शाम को गन्नो के रस की बखीर बनाकर पूजा घर में पांच जगह कोशा(मिट्टी के बर्तन) में बखीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में बखीर का ही भोजन किया जाता है व सगे संबंधियों में इसे बांटा जाता है।

तीसरे दिन यानी छठ के दिन 24 घंटे का निर्जल व्रत रखा जाता है, सारे दिन पूजा की तैयारी की जाती है और पूजा के लिए एक बांस की बनी हुई बड़ी टोकरी, जिसे दौरी कहते हैं, में पूजा का सभी सामान डाल कर पूजा-गृह में रख दिया जाता है। यहीं गन्नो से एक छत्र बनाकर और उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा बर्तन, दीपक तथा मिट्टी के हाथी बना कर रखे जाते हैं और उसमें पूजा का सामान भर दिया जाता है।

वहां पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल कपड़े में लिपटा हुआ नारियल, पांच प्रकार के फल, पूजा का अन्य सामान ले कर दौरी में रख कर घर का पुरुष इसे अपने हाथों से उठा कर नदी, समुद्र या पोखर पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो जाए इसलिए इसे सिर के उपर रखते हैं। पुरुष, महिलाएं, बच्चों की टोली एक सैलाब की तरह दिन ढलने से पहले नदी के किनारे सोहर गाते हुए जाते हैं।

इस पूजा की खास बात यह है कि पूजा में वही चीजें चढ़ेंगी जो किसानी जीवन में सर्वाधिक सुलभ है। गुड़, गन्ना, सिंघाड़ा, नारियल, केला, नींबू, हल्दी, अदरक, सुपारी, साठी का चावल, जमीरी, संतरा, मूली आदि।

नदी किनारे जा कर नदी से मिट्टी निकाल कर छठ माता का चौरा बनाते हैं वहीं पर पूजा का सारा सामान रख कर नारियल चढ़ाते हैं और दीप जलाते हैं। उसके बाद टखने भर पानी में जा कर खड़े होते हैं और सूर्य देव की पूजा के लिए सूप में सारा सामान ले कर पानी से अर्घ्य देते हैं और पांच बार परिक्रमा करते हैं। सूर्यास्त होने के बाद सारा सामान ले कर सोहर गाते हुए घर आ जाते हैं और पूजा-घर में रख देते हैं। रात को पूजा करते हैं। श्रद्धालु अगले दिन सुबह सूर्योदय से दो घंटे पहले सारा पूजा का सामान ले कर नदी किनारे जाते हैं। पूजा का सामान फिर उसी प्रकार नदी से मिट्टी निकाल कर चौक बना कर उस पर रखा जाता है और पूजन शुरू होता है।

सूर्य देव की प्रतीक्षा में महिलाएं हाथ में सामान से भरा सूप ले कर सूर्य देव की आराधना व नदी में ही खड़े होकर पूजा करती हैं। सूर्य की पहली किरण पर ही सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। शाम को पानी से अर्घ देते हैं लेकिन सुबह दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस समय सभी नदी में नहाते हैं तथा गीत गाते हुए पूजा का सामान ले कर घर आ जाते हैं।

घर पहुंच कर पूजा-घर में पूजा का सामान रख दिया जाता है और महिलाएं प्रसाद ले कर अपना व्रत खोलती हैं तथा प्रसाद परिवार व सभी परिजनों में बांटा जाता है। मन्नत के लिए कोशी (गोद भराई) का भी बड़ा महत्व है।

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