Thursday, 30 October 2014

भारत का एकमात्र पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर

भारत में बना एकमात्र सूर्य मंदिर जो प्रात:कालीन सूर्य की रश्मियों का अभिषेक नहीं कर पाता वरन अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें ही मंदिर का अभिषेक करती हैं। पूरे भारत में देव का मंदिर ही एकमात्र ऐसा सूर्य मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है। बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित ऐतिहासिक त्रेतायुगीन पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ठ कलात्मक भव्यता के लिए सर्वविदित और प्रख्यात होने के साथ ही सदियों से देशी-विदेशी पर्यटकों, श्रद्धालुओं और छठ व्रतियों की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है।

करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भूत उदाहरण है। बिना सीमेंट अथवा चूना-गारा का प्रयोग किए आयताकार, वर्गाकार, आवत्र्तकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रूपों और आकारों में काटे गए पत्थरों को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक एवं विस्मयकारी है। इसके काले पत्थरों की नक्काशी अप्रतीम है।

देव मंदिर में सात घोड़ों से युक्त रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों- उदयाचल-प्रात: सूर्य मध्याचल- मध्य सूर्य और अस्ताचल-अस्त सूर्य के रूप में विद्यमान है।

जनश्रुतियों के आधार पर इस मंदिर के निर्माण के संबंध में कई किंवदतियां प्रसिद्ध है जिससे मंदिर के अति प्राचीन होने का स्पष्ट पता तो चलता है।

सूर्य पुराण के अनुसार ऐल एक राजा थे जो किसी ऋषि के शापवश श्वेत कुष्ठ रोग से पीडित थे। वे एक बार शिकार करने देव के वनप्रांत में पहुंचने के बाद राह भटक गए। उसी वनप्रान्त मे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखायी पड़ा जिसके किनारे वे पानी पीने के लिए रुक गए । अचानक राजा ने देखा कि शरीर के जिस भाग पानी का स्पर्श हुआ था वहाँ पर श्वेत कुष्ठ के दाग जाते रहे। इससे अति प्रसन्न और आश्चर्यचकित राजा सरोवर के गंदे पानी में लेट गए और इससे उनका शवेत कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया । राजा ऐल ने इसी वन में रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया और रात्रि में राजा को स्वप्न आया कि सरोवर में भगवान भास्कर की प्रतिमा दबी हुई है। स्वप्न के अनुसार राजा को प्रतिमा को निकालकर वहीं मंदिर बनवाने और प्रतिमा को उसमें प्रतिष्ठित करने का निर्देश प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि राजा ऐल ने इसी निर्देश के मुताबिक सरोवर से दबी मूर्त को निकालकर मंदिर में स्थापित कराने का काम किया और सूर्य कुंड का निर्माण कराया लेकिन मंदिर यथावत रहने के बावजूद उस मूर्त का आज तक पता नहीं है। वर्तमान मूर्त प्राचीन अवश्य है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है जैसे मूर्त को बाद में स्थापित किया गया हो। मंदिर परिसर की मूर्तियां खंडित तथा जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं।

मंदिर निर्माण के संबंध में एक कहानी यह भी प्रचलित है कि इसका निर्माण एक ही रात में देवशिल्पी भगवान विशवकर्मा ने अपने हाथों किया था। कहा जाता है कि इतना सुंदर मंदिर कोई साधरण शिल्पी बना ही नहीं सकता।


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